ब्रम्ह्मतत्वं न जानाति दर्वी सूपरसं यथा ||
Labels
- अध्यात्म (38)
- गुरु ( GURU ) (11)
- जीवन (Life) (81)
- दान (donation) (13)
- परिश्रम ( Hard Work ) (6)
- माँ (8)
- विद्या ( KNOWLEDGE ) (23)
- सज्जन - दुर्जन (35)
- सफलता success (7)
- सुभाषित (50)
- सुविचार (66)
- सूक्ति (36)
- हितोपदेश (24)
Tuesday, 10 April 2018
ब्रम्ह्मतत्वं न जानाति दर्वी सूपरसं यथा ||
Tuesday, 27 March 2018
पात्यते तु क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयो: ||
Friday, 23 March 2018
Saturday, 17 March 2018
Saturday, 17 February 2018
अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् |
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् |
यह मेरा है,यह उसका है ; ऐसी सोच संकुचित चित्त वोले व्यक्तियों की होती है
;इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह सम्पूर्ण धरती ही एक परिवार जैसी होती है |
It is mine, it is his; Such thinking is of a narrow minded person;
on the contrary, for the liberals, this whole earth is like a family.
Wednesday, 14 February 2018
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
क्षण-क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए। क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता
To use moment and moment to learn and use every small coins to save it.
Can not attain attainment by destroying the moment and money
can not be obtained by destroying coins
Tuesday, 13 February 2018
यया बद्धा: प्राधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पङ्गुवत् ॥
आशा नामक एक विचित्र और आश्चर्यकारक शॄंखला है ।
इससे जो बंधे हुए है वो इधर उधर भागते रहते है
तथा इससे जो मुक्त है वो पंगु की तरह शांत चित्त से
एक ही जगह पर खडे रहते है
Hope is a strange and amazing series.
Those who are bound by it keep away from it and who are free from it,
they remain standing in the same place from the calm mind like paranoid
Thursday, 1 February 2018
नीर क्षीर विवेके हंस आलस्यम् त्वम् एव तनुषे चेत् ।
विश्वस्मिन् अधुना अन्य: कुलव्रतं पालयिष्यति क: ॥
अरे हंस यदि तुम ही पानी तथा दूध भिन्न करना छोड दोगे तो दूसरा कौन तुम्हारा यह कुलव्रत का पालन कर सकता है ? यदि बुद्धि वान् तथा कुशल मनुष्य ही अपना कर्तव्य करना छोड दे तो दूसरा कौन वह काम कर सकता है ?
Oh, dear Swan ! if you leave the water and milk separation, then who else can follow this scripture of yours? If the intellect and the skilled man leave his duty, then who else can do that work?
Tuesday, 30 January 2018
पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु |
शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा पुरुषः पञ्चलक्षणम् ||
सुपात्र व्यक्तियों का सहायक, गुणी जनों का आदर करने वाला, पैतृक संपत्ति को अपने भाइयों में समान भागों मे वितरित करने वाला, शास्त्रों का ज्ञाता , तथा युद्ध में योद्धा के रूप में कुशल , ये पांच विशेषतायें एक महापुरुष के लक्षण कहे गये हैं |
A benefactor and helper of deserving persons, appreciator and patron of talented and virtuous persons, sharing of wealth equally with one's brothers, being well versed in Shastras, and as a warrior during a battle, these are the five traits of an illustrious and great person.
Sunday, 21 January 2018
श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन,
दानेन पाणिर्न तु कंकणेन,
विभाति कायः करुणापराणां,
परोपकारैर्न तु चन्दनेन ||
कानों की शोभा कुण्डलों से नहीं अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है | हाथ दान करने से सुशोभित होते हैं न कि कंकणों से | दयालु / सज्जन व्यक्तियों का शरीर चन्दन से नहीं बल्कि दूसरों का हित करने से शोभा पाता है |
Wednesday, 20 December 2017
Wednesday, 29 November 2017
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति
विज्ञाय चार्थ भते न कामात्।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे
तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥
ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं । किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते है, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते ।
Tuesday, 31 October 2017
आरोग्यं भास्कराद् ईच्छेत् -
ज्ञानं मिच्छेत् महेश्वरात्।
श्रीयं हुताशनाद् ईच्छेत्-
मोक्षमिच्छेत् जनार्दनात्।।
आरोग्य यदि अनुकुल न हो तो सूर्य की उपासना करनी चाहिए, वैसे ही ज्ञान की प्राप्ति के लिए शिवजी की साधना करनी चाहिए, और लक्ष्मीजी की प्राप्ति के लिए अग्नि का पूजन तथा यज्ञ विधान करना चाहिए और मोक्ष प्राप्ति के लिए केवल विष्णु की ही उपासना श्रेष्ठ है।।
Tuesday, 24 October 2017
पंगो ! धन्यस्त्वमसि न गृहं यासि योऽर्थी परेषाम्
धन्योऽन्ध ! त्वं धनमदवतां नेक्षसे यन्मुखानि ।
श्लाध्यो मूक ! त्वमपि कृपणं स्तौषि नार्थाशयायः
स्तोतव्यस्त्वं बधिर् ! न गिरं यःखलानां शृणोपि ॥
हे पंगु ! तू धन्य है कि अर्थांध होकर धनवान के घर नहीं जाता । हे अंधे ! तू धन्य है कि धन के मद में प्रचुर लोगों के मुँह नहीं देखता । हे गूँगे ! तू धन्य है कि धन पाने की आशा से कंजूस की स्तुति नहीं करता । हे बेहरे ! तू भी स्तुतितुल्य है क्यों कि तू दुर्जनों की वाणी नहीं सुनता ।
Thursday, 28 September 2017
मनसा चिन्तितंकार्यं वचसा न प्रकाशयेत्।
अन्यलक्षितकार्यस्य यत: सिद्धिर्न जायते॥
While thinking of doing some work, don't disclose it to others. If others also target it, it might not succeed.
मन से सोचे हुए कार्य को वाणी से न बताए क्योंकि जिस कार्य पर किसी और की दृष्टि लग जाती है, वह फिर पूरा नहीं होता।
Monday, 25 September 2017
किम् अपि अस्ति स्वभावेन सुन्दरं वा अपि असुन्दरम् |
यद् एव रोचते यस्मै भवेत् तत् तस्य सुन्दरम् ||
Any thing that we see in this world, is it beautiful or ugly in it's very nature? (Of-course No) The thing which is liked by any individual is felt beautiful by that individual! For example a ugly looking child is still loved very much by his/her mother.
किसी की भी सुन्दरता और कुरूपता का कारण उसके गुण (स्वभाव) कहाँ होते हैं? जो प्रिय है वही सुन्दर लगता है। (जैसे कुरूप से कुरूप बालक अपनी माँ को प्रिय होने के कारण, माँ को सदा ही सुन्दर लगता है)
Tuesday, 5 September 2017
कार्यमण्वपि काले तु कॄतमेत्युपकारताम् |
महदप्युपकारोऽपि रिक्ततामेत्यकालत: ||
Even a very small thing done for somebody is very helpful if done at a proper time. But if one does not do it at a proper time (does it when it is not called for), then a (apparently) big favor to a person will be in vain.
किसीका छोटासा भी काम अगर सही समय पे करे तो वह उपकारक होता है। परंतु अगर गलत समय पे करे तो बहुत बडा काम भी किसी काम का नही होता है।
Monday, 4 September 2017
धनेन किं यो न ददाति नाश्रुते,
बलेन कि यश्च रिपून्न बाधते।
श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत्,
किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत्।
उस धन से क्या है ? जो न देता है और न खाता है,
उस बल से क्या है ? जो वैरियों को नहीं सताता है,
उस शास्र से क्या है ? जो धर्म का आचरण नहीं करता है
और उस आत्मा से क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है।
Friday, 25 August 2017
जय श्रीकृष्ण
आक्रान्तं मरणेन जन्म जरसा चात्युज्ज्वलं यौवनं,
संतोषो धनलिप्स्या शमसुखं प्रौढाङ्गनाविभ्रमै:।
लोकैर्मत्सरिभिर्गुणा वनभुवो व्यालैनृपा दुर्जनै-
रस्थैर्येण विभूतयोऽप्युपहता ग्रस्तं न किं केन वा ।।
जीवन को मृत्यु ने घेर रखा है, यौवन को बुढ़ापे ने, संतोष को लोभ ने, इन्द्रिय-निग्रह से होने वाले सुख को विषयों ने, सद्गुणों को ईर्ष्या ने, जंगलों को हिंसक जानवरों ने, राजाओं को दुष्ट लोगों ने और धन-दौलत को अस्थिरता ने घेरा हुआ है।
इस प्रकार सभी वस्तुएँ किसी न किसी के द्वारा आक्रान्त या ग्रसित हैं, एक वैराग्य ही निरापद है जो किसी से जकड़ा हुआ नहीं है ।🙏