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Monday, 9 April 2018
Sunday, 18 February 2018
विनये भॄत्यपरीक्षा दानपरीक्षाच दुर्भिक्षे ||
Monday, 4 September 2017
अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं
सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति।
जीवत्यनाथोsपि वने विसर्जितः।
कृतप्रयत्नोsपि गृहे न जीवति।।
दैव से रक्षा किया हुआ, बिना रक्षा के भी ठहरता है और अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैव का मारा हुआ नहीं बचता है,
जैसे वन में छोड़ा हुआ सहायताहीन भी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करने से भी नहीं जीता है।
धनेन किं यो न ददाति नाश्रुते,
बलेन कि यश्च रिपून्न बाधते।
श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत्,
किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत्।
उस धन से क्या है ? जो न देता है और न खाता है,
उस बल से क्या है ? जो वैरियों को नहीं सताता है,
उस शास्र से क्या है ? जो धर्म का आचरण नहीं करता है
और उस आत्मा से क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है।
Saturday, 29 July 2017
Sunday, 23 July 2017
Saturday, 22 July 2017
सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः,
सुशासिता स्री नृपति: सुसेवितः।
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं,
सुदीर्घकालेsपि न याति विक्रियाम्।।
अच्छी रीति से पका हुआ भोजन, विद्यावान पुत्र, सुशिक्षित अर्थात आज्ञाकारिणी स्री, अच्छे प्रकार से सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन, और विचार कर किया हुआ काम ये बहुत काल तक भी नहीं बिछड़ते हैं।