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Monday, 9 April 2018

ऐक्यं बलं समाजस्य तदभावे स दुर्बल:
तस्मात ऐक्यं प्रशंसन्ति दॄढं राष्ट्र हितैषिण: ll
एकता किसी भी समाज की ताकत है और यह (समाज) एकता के बिना कमजोर है। इसीलिए राष्ट्र के कल्याणकों ने एकता की सराहना की।
Unity is the strength of any society and it (society) is weak without unity. Hence wellwishers of the nation strongly praise unity.

Sunday, 18 February 2018

व्यसने मित्रपरीक्षा शूरपरीक्षा रणाङ्गणे भवति |
विनये भॄत्यपरीक्षा दानपरीक्षाच दुर्भिक्षे ||
एक दोस्त की मैत्री का परीक्षण हमारे बुरे समय में किया जाता है, योद्धा की वीरता का युद्ध में परीक्षण किया जाता है, एक नौकर का परीक्षण स्वामी के प्रति अपने अच्छे दृष्टिकोण में है और दाता का परीक्षण सूखे के समय होता है इस बात को समझाया गया है कि जो व्यक्ति सूखे के समय भी धन / भोजन दान करता है, यानी ऐसे समय जब भोजन की कमी होती है, वह एक असली दाता है अगर हम कठिन समय पर हमारी उम्मीदों पर नहीं जीते हैं तो इसके लिए हम जो भी खड़े हैं उसका कोई फायदा नहीं है ..

Friendship of a friend is tested in our bad times, the warrior's heroism is tested in a war, a servant's test lies in his good attitude towards the owner and a donor's test is at the time of drought. The point explained here is that the person who donates wealth/food even at the time of a drought, i.e. at the times when the food is a scarcity, is a real donor. If we do not live up to our expectations at the tough times then there is no use of what we stand for.

Monday, 4 September 2017

जीविते यस्य जीवन्ति विप्रा मित्राणि बान्धवा:।
सफलं जीवितं तस्य आत्मार्थे को न जीवति ?
जिसके जीने से ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं,
उसी का जीवन सफल है और केवल अपने स्वार्थ के लिए कौन नहीं जीता है ?

अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं
सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति।
जीवत्यनाथोsपि वने विसर्जितः।
कृतप्रयत्नोsपि गृहे न जीवति।।
दैव से रक्षा किया हुआ, बिना रक्षा के भी ठहरता है और अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैव का मारा हुआ नहीं बचता है,
जैसे वन में छोड़ा हुआ सहायताहीन भी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करने से भी नहीं जीता है।

दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै।
स कर्मकारभस्रेव श्वसन्नपि न जीवति।।
दान और भोग के बिना जिसके दिन जाते हैं,
वह लुहार की धोंकनी के समान सांस लेता हुआ भी मरे के समान है।

धनेन किं यो न ददाति नाश्रुते,
बलेन कि यश्च रिपून्न बाधते।
श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत्,
किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत्।
उस धन से क्या है ? जो न देता है और न खाता है,
उस बल से क्या है ? जो वैरियों को नहीं सताता है,
उस शास्र से क्या है ? जो धर्म का आचरण नहीं करता है
और उस आत्मा से क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है।

आलस्यं स्री सेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम्।
संतोषो भीरुत्वं षड् व्याघाता महत्वस्य।।
आलस्य, स्री की सेवा, रोगी रहना, जन्मभूति का स्नेह, संतोष और डरपोकपन ये छः बातें उन्नति के लिये बाधक है।

ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम्।
शशिनस्तुल्यवंशोsपि निर्धनः परिभूयते।।
जिसके पास बहुत सा धन है, उस ब्रह्मघातक मनुष्य का भी सत्कार होता है
और चंद्रमा के समान अतिनिर्मल वंश में उत्पन्न हुए भी निर्धन मनुष्य का अपमान किया जाता है।

यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्रलाघ्यस्तत्राल्पधीरपि।
निरस्तपादपे देशे एरण्डोsपि द्रुमायते।।
जहाँ पंडित नहीं होता है, वहाँ थोड़े पढ़े की भी बड़ाई होती है।
जैसे कि जिस देश में पेड़ नहीं होता है, वहाँ अरण्डाका वृक्ष ही पेड़ गिना जाता है।

Saturday, 29 July 2017

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ,
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम।
आपदा में धीरज, बढ़ती में क्षमा, सभा में वाणी की चतुरता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्र में अनुराग ये बातें महात्माओं में स्वाभाव से ही होती है।

स बंधुर्यो विपन्नानामापदुद्धरणक्षमः।
न तु भीतपरित्राणवस्तूपालम्भपण्डितः।।
बंधु वह है, जो आपत्ति में पड़े हुए मनुष्यों को निकालने में समर्थ हो और जो दुखियों की रक्षा करने के उपाय बताने की बजाय उलाहना देने में चतुराई समझे, वह बंधु नहीं है।

शरीरस्य गुणानां च दूरमत्यन्तमन्तरम।
शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनों गुणा:।।

शरीर और दयादि गुणों में बड़ा अंतर है। शरीर तो क्षणभंगुर है और गुण कल्प के अंत तक रहने वाले हैं।

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालंकृतोsपि सन।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।

दुर्जन विद्यावान भी हो, परंतु उसे छोड़ देना चाहिये, क्योंकि रत्न से शोभायमान सपं क्या भयंकर नहीं होता है

रोगशोकपरीतापबन्धनव्यसनानि च।
आत्मापराधवृक्षाणां फलान्येतानि दहिनाम्।

रोग, शोक, पछतावा, बंधन और आपत्ति ये देहधारियों (प्राणियों) के लिए अपने अपराधरुपी वृक्ष के फल हैं।

Sunday, 23 July 2017

वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं
द्रुमालयं पक्कफलाम्बुभोजनम्।
तृणानि शय्या परिधानवल्कलं,
न बंधुमध्ये धनहीनजीवनम्।।

सिंह और हाथियों से भरे हुए वन के नीचे रहना, पके हुए कंद मूल फल खाकर जल पान करना तथा घास के बिछौने पर सोना और छाल के वस्र पहनना अच्छा है, पर भाई बंधुओं के बीच धनहीन जीना अच्छा नहीं है।

Saturday, 22 July 2017

असंभव हेममृगस्य जन्म ,
तथापि रामो लुलुभे मृगाय।
प्रायः समापन्नविपत्तिकाले,
धियोsपि पुंसां मलिना भवन्ति।।
सोने के मृग का होना असंभव है, तब भी रामचंद्रजी सोने के मृग के पीछे लुभा गये, इसलिये विपत्तिकाल आने पर महापुरुषों की बुद्धियाँ भी बहुधा मलिन हो जाती है।

लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते।
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम।

लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से विषय भोग की इच्छा होती है और लोभ से मोह और नाश होता है, इसलिए लोभ ही पाप की जड़ है।

सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः,
सुशासिता स्री नृपति: सुसेवितः।
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं,
सुदीर्घकालेsपि न याति विक्रियाम्।।
अच्छी रीति से पका हुआ भोजन, विद्यावान पुत्र, सुशिक्षित अर्थात आज्ञाकारिणी स्री, अच्छे प्रकार से सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन, और विचार कर किया हुआ काम ये बहुत काल तक भी नहीं बिछड़ते हैं।

शत्रुणा न हि संदध्यात सुश्लिष्टेनापि संधिना।
सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम्।।

और यह कहा है कि वैरी चाहे जितना मीठा बन कर मेल करे, परंतु उसके साथ मेल न करना चाहिये, क्योंकि पानी चाहे जितना भी गरम हो आग को बुझा ही देता है।

सुमहान्त्यपि शास्राणि धारयन्तो बहुश्रुतः।
छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्ते लोभमोहितः।।

अच्छे बड़े- बड़े शास्रों को पढ़ने तथा सुनने वाले और संदेहों को दूर करने वाले भी लोभ के वश में पड़ कर दुख भोगते हैं।