विद्याहीना: न शोभन्ते निर्गन्धा: किंशुका: इव ||
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Sunday, 25 March 2018
विद्याहीना: न शोभन्ते निर्गन्धा: किंशुका: इव ||
Sunday, 11 February 2018
Saturday, 10 February 2018
कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम् ||
पुस्तक में रखी विद्या तथा दूसरे के हाथ में गया धन
ये दोनों ही ज़रूरत के समय हमारे किसी भी काम नहीं आया करते |
Both of the knowledge kept in the book
and the money gone in the hands of others,
both of them did not come at any time when we needed them
Friday, 26 January 2018
Thursday, 7 December 2017
Wednesday, 29 November 2017
तत् कर्म यत् न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
आयासाय अपरं कर्म विद्या अन्याशिल्पनैपुणम्॥
That is action which does not bind. That is knowledge which liberates. Other actions are hardship only and other knowledge are just mechanical skills
वह कर्म है जो बंधन में न डाले, वह विद्या है जो मुक्त कर दे। अन्य कर्म श्रम मात्र हैं और अन्य विद्याएँ यांत्रिक निपुणता मात्र है।
Tuesday, 10 October 2017
धनवृद्धा बलवृद्धा, आयुवृद्धास्तथैव च।
ते सर्वेऽपि ज्ञानवृद्धाश्च, किंकिरा शिष्य किंकिरा।।
इस संसार में धनवृद्ध (बहुत धनवान ), बलवृद्ध (बहुत बलवान , आयुवृद्ध ( बहुत अधिक आयु ) वाले की अपेक्षा ज्ञानवृद्ध ( शास्त्रो का ज्ञान ) को अधिक महत्व दिया गया है । क्योकि धन, बल, आयु को एक ना एक दिन नष्ट होना है , किन्तु ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता। यह जन्म जन्मान्तर तक जीव का साथ देता है । इस कारण ज्ञानवृद्ध का सर्वाधिक महत्व है।
Monday, 18 September 2017
सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
अहार्यत्वादनर्घ्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥
Among all things knowledge only, they say, is a supreme treasure because it cannot be stolen, it is priceless and always imperishable.
सब द्रव्यों में विद्यारुपी द्रव्य सर्वोत्तम है, क्यों कि वह किसी से हरा नहि जा सकता; उसका मूल्य नहि हो सकता, और उसका कभी नाश नहि होता।
Monday, 17 July 2017
Friday, 14 July 2017
Saturday, 17 June 2017
Wednesday, 14 June 2017
मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणं चिन्तासमं नास्ति शरीरशोषणं।
मित्रं विना नास्ति शरीर तोषणं विद्यां विना नास्ति शरीरभूषणं॥
_Nothing nourishes body like balanced life. Nothing sucks body like anxiety. Nothing pleases body like friend. There is no ornament for body like knowledge._
संतुलित जीवन के समान शरीर का पोषण करने वाला दूसरा नहीं है, चिंता के समान शरीर को सुखाने वाला दूसरा नहीं है, मित्र के समान शरीर को आनंद देने वाला दूसरा नहीं है और विद्या के समान शरीर का दूसरा कोई आभूषण नहीं है ।
अत्याहारः प्रवासश्च प्रजल्पो नियमग्रहः ।
जनसङ्गश्व लौल्यंच षड्भिः योगो विनश्यति ॥
_Eating food excessively, exerting too much, Speaking too much (unnecessary talks), fasting too much, associating with insignificant people, devotion to sensual pleasures obstruct the practice of Yoga/spirituality._
अति आहार, अधिक श्रम, बहुत बोलना, उपवास, सामान्य लोगों का संग, और स्वादलोलुपता- इनसे योगाभ्यास में बाधा आती है ।
सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखं।
सुख चाहने वालो को विद्या और विद्या चाहने वालोंको सुख त्याग देना चाहिए। सुख चाहने वाले के लिए विद्या कहाँ और विद्यार्थी के लिए सुख कहाँ।
If you aspire for comforts, leave the knowledge. If you aspire for knowledge, leave the comforts. Aspirant for comforts cannot get knowledge and aspirant for knowledge cannot get comforts.
Monday, 12 June 2017
न हि ज्ञानसमं लोके पवित्रं चान्यसाधनं।
विज्ञानं सर्वलोकानामु-त्कर्षाय स्मृतं खलु॥
There is nothing more sacred than knowledge in this world. In scriptures, science is considered fundamental to progress of this world.
इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र दूसरा कोई साधन नहीं है, शास्त्रों में विज्ञान को समस्त लोकों की प्रगति के लिए निश्चित किया गया है।
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
Knowledge gives humility, humility leads to capability, from capability one acquires wealth, wealth leads to righteousness and then happiness follows.
विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन की प्राप्ति होती है, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।
Monday, 29 May 2017
क्षणत्यागे कुतो विद्या कळत्यागे कुतो धनं।
क्षण क्षण विद्या के लिए और कण कण धन के लिए प्रयत्न करना चाहिए। समय नष्ट करने पर विद्या साधनों को नष्ट करने पर धन कैसे प्राप्त हो सकता है।
Knowledge should be gained though minute by minute efforts. Money should be earned utilizing each and every resource. If you waste time, how can you get knowledge. If you waste resource, how can you accumulate the wealth.
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।
विद्वान् व्यक्ति और राजा अतुलनीय है, राजा को तो अपने राज्यमें ही सम्मान मिलता है पर विद्वान् व्यक्ति का सर्वत्र सन्मान होता है।
Intelligence and kingdom can never be compared. A king is respected in his own land whereas a wise man is respected everywhere.