Showing posts with label दान (donation). Show all posts
Showing posts with label दान (donation). Show all posts

Friday, 13 April 2018

गौरवं प्राप्यते दानात् न तु वित्तस्य संचयात् |
स्थिति: उच्चै: पयोदानां पयोधीनां अध: स्थिति: ||
पैसे का दान करके ही गौरव प्राप्त किया जाता है न की धन का संचय करके, जैसे पानी देने वाले बादल ऊपर रहते है और सागर पानी लेने वाला निचे रहता है 
Fame is obtained by donating (giving) money, not collecting it. Clouds (givers of water) have a high position whereas the seas (reservoirs of water) have a low position.

Thursday, 22 February 2018

दानेन तुल्यो विधिरास्ति नान्यो लोभोच नान्योस्ति रिपु: पॄथिव्या |
विभूषणं शीलसमं च नान्यत् सन्तोषतुल्यं धनमस्ति नान्यत् ||
इस धरती पर दान जैसी कोई क्रिया नहीं है, लोभ जैसा कोई दुश्मन नहीं है, चरित्र जैसा कोई आभूषण नहीं है और संतोष जैसा कोई धन नहीं है।  
There is no vidhi (ritual) which is as noble as donation. (People follow some rituals to get some "punya". this subhashit says that sharing your wealth with others is the best possible ritual.) There is no enemy as greed on this earth. (Greed gives rise to problems in life, that's why it is our biggest enemy) There is no other ornament like sheela (good character). (We use ornaments to adorn our body, but there is no ornament comparable to good character.) There is no wealth as satisfaction. (We earn wealth for being happy, but satisfaction is key to happiness.)

Wednesday, 13 September 2017

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्।।

Donating earned wealth is the best way to protect it. (Just like) allowing water to flow out of a lake is best way to keep the lake clean.

कमाए हुए धन का त्याग(दान) करनेसे ही उसका रक्षण होता है। जैसे तालाब का पानी बहते रहने सेे साफ रहता है।

Monday, 4 September 2017

दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै।
स कर्मकारभस्रेव श्वसन्नपि न जीवति।।
दान और भोग के बिना जिसके दिन जाते हैं,
वह लुहार की धोंकनी के समान सांस लेता हुआ भी मरे के समान है।

Saturday, 26 August 2017


उपकारः परो धर्मःपरोर्थः कर्मनैपुणम्
पात्रे दानं परः कामः परो मोक्षो वितृष्णता||

नि:स्वार्थ भाव से लोगों की सहायता करना सर्वोत्तम धार्मिक आचरण है तथा सर्वोत्तम संपत्ति किसी भी प्रकार के कार्य में निपुणता है,
सुपात्र व्यक्तियों को दान देना सर्वोत्तम दान है।

इसके पश्चात अत्यधिक लालच न करते हुए अपनी इच्छाओं की पूर्ति और अन्ततः मोक्ष की प्राप्ति ही जीवन का सर्वोत्तम् ध्येय है।"

Monday, 17 July 2017

हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥

हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?

दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते ।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः ॥

दान से स्वर्ग प्राप्त होता है, दान से सुख भोग्य बनते हैं । यहाँ और परलोक में इन्सान दान से पूज्य बनता है ।

सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषग् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥

कांरवाँ प्रवासी का मित्र है, पत्नी गृह में रहेनेवाले की मित्र है, वैद्य रोगी का और दान मरते हुए मनुष्य का (या मर्त्य मनुष्य का) मित्र है ।

अल्पमपि क्षितौ क्षिप्तं वटबीजं प्रवर्धते ।
जलयोगात् यथा दानात् पुण्यवृक्षोऽपि वर्धते ॥

जमीन पर डाला हुआ छोटा सा वटवृक्ष का बीज, जैसे जल केयोग से बढता है, वैसे पुण्यवृक्ष भी दान से बढता है ।

गर्जित्वा बहुदूरमुन्नति-भृतो मुञ्चन्ति मेघा जलम्
भद्रस्यापि गजस्य दानसमये सञ्जायतेऽन्तर्मदः । पुष्पाडम्बर यापनेन ददति प्रायः फलानि द्रुमाः
नो छेको नो मदो न कालहरणं दान प्रवृतौ सताम् ॥

उन्नत ऐसे बादल, दूर से गर्जना करके पानी देते हैं, भद्र हाथी में भी दान के समय (गण्डस्थल में रस उत्पन्न होते वक्त) मद उत्पन्न होता है, वृक्ष भी पुष्पों का आडंबर दूर करके फल देते हैं; अर्थात् दानप्रवृत्त होने में सज्जनों को दंभ, घमंड या कालहरण होते नहीं ।

दाता नीचोऽपि सेव्यः स्यान्निष्फलो न महानपि ।
जलार्थी वारिधि त्यक्त्वा पश्य कूपं निषेवते ॥

दाता नीच हो (छोटा हो) तो भी उसका आश्रय लेना, पर जो फलरहित है, वह बडा हो (महान हो), फिर भी उसका आश्रय नहि लेना । देखो ! प्यासा, सागर का त्याग करके कूए के पास ही जाता है ।

शतेषु जायते शूरः सहस्त्रेषु च पण्डितः ।
वक्ता दशसहस्त्रेषु दाता भवति वा न वा ॥

शूर सौ में एक, पण्डित हजार में एक और वक्ता दसहजार में एक हो सकता है; पर दाता तो कोई मुश्किल से ही मिलता है ।

दानं ख्यातिकरं सदा हितकरं संसार सौख्याकरं
नृणां प्रीतिकरं गुणाकरकरं लक्ष्मीकरं किङ्करम्। स्वर्गावासकरं गतिक्षयकरं निर्वाणसम्पत्कर
म्वर्णायु र्बलबुद्धि वर्ध्दनकरं दानं प्रदेयं बुधैः॥

दान ख्याति बढानेवाला, सदा हित करनेवाला, संसार सुखीकरनेवाला, प्रीतिकर, गुणों का लानेवाला, लक्ष्मीदायक, सेवकरुप, स्वर्गदाता, गति क्षय करनेवाला, मोक्षरुप संपत्त देनेवाला, आयुष्य, बल और बुद्धिदाता है । (इस लिए) बुद्धिमान् लोगों को दान करना चाहिए ।